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फिर कौन बचाएगा मानवाधिकारों को?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) से निकलने का अमेरिकी फैसला पूरी दुनिया को चैंकाने वाला है क्योंकि इससे पूरी दुनिया में मानवाधिकारों से जुड़े प्रश्न और जटिल एवं असुरक्षित होंगे। एक बढ़ा प्रश्न है कि मानवाधिकारों को कौन बचायेगा? कौन रेखा खीचेगा दुनिया में बढ़ रही अमानवीय, बर्बर एवं हिंसक गतिविधियों और सामान्य नागरिक के मानवाधिकारों के बीच? मानवाधिकार के संरक्षण के लिए और विशेषाधिकारों के प्रतिबंध के लिए कौन लड़ेगा? युद्ध, परमाणु विस्फोट, साम्प्रदायिक दंगे, पुलिस अत्याचार, बच्चों के साथ दुव्र्यवहार, चोरी, लूट, महिलाओं पर अत्याचार, नशीली वस्तुओं का गैर कानूनी धंधा, रोजमर्रा की बात हो गई है। शांति-प्रिय नागरिकों का जीना मुश्किल हो गया है। जन प्रतिनिधियों और राजनीतिज्ञों पर लोगों का विश्वास नहीं रहा। इन जटिल से जटिल होते हालातों पर नियंत्रण के लिये ही यूएनएचआरसी की संरचना बनी थी। 

यूएनएचआरसी का गठन 2006 में हुआ था, तभी से अमेरिका ने खुद को इससे अलग ही रखा था। बराक ओबामा के कार्यकाल में वह इसमें शामिल हुआ और अब इजरायल के खिलाफ पूर्वाग्रहों का आरोप लगाते हुए इससे बाहर हो गया। यह समस्या सिर्फ अमेरिका ही नहीं, कई अन्य देशों के भी साथ है। जब दूसरे देशों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर चर्चा होती है, वे पूरे उत्साह के साथ इसमें शामिल रहते हैं, मगर जैसे ही खुद उनका या उनके करीबी राष्ट्र का मामला सामने आता है, उन्हें मानवाधिकार संगठनों का पूर्वाग्रह नजर आने लगता है, उनके नजरिए में बुनियादी बुराई या विसंगति दिखने लगती है। अमेरिका के साथ भी कुछ ऐसा ही है। ट्रम्प प्रशासन का यह फैसला भी यूएन ह्यूमन राइट्स के हाई कमिश्नर के उस आरोप के बाद आया है, जिसमें मैक्सिको बार्डर पर माता-पिता को उनके बच्चों से अलग करने के निर्णय को हद से ज्यादा गलत एवं अमानवीय कदम बताया गया था। कई मानवाधिकार संगठन ट्रम्प प्रशासन पर मानवाधिकार को विदेश नीतियों में शामिल नहीं करने का आरोप लगाते हैं।

अमेरिका तीन साल से यूएनएचआरसी का सदस्य है। इस परिषद में अमेरिका का अभी डेढ़ साल पूरा हुआ था। बीते दिनों यह खबर आई थी कि परिषद में अमेरिका द्वारा दिये गये सुझावों एवं सुधारों पर सहमति नहीं बनी थी और उसकी मांगों को नहीं माना गया था। तभी से यह खबर आ रही थी कि अमेरिका यूएनएचआरसी से हट जाएगा। उसका यह भी आरोप था कि चीन, क्यूबा, ईरान और वेनेजुएला जैसे परिषद में कई ऐसे सदस्य देश हैं जो अपने नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकार की भी इज्जत नहीं करते, लेकिन परिषद लगातार उन देशों की मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को नजरअंदाज करता रहा है और उन राष्ट्रों को बलि का बकरा बनाता है जिनका मानवाधिकार के मामले में रिकॉर्ड बेहतर है, ताकि वो इसे तोड़ने वालों से दुनिया का ध्यान हटा सके।

अमेरिका पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। बच्चों से दुव्र्यवहार, गोपनीयता का उल्लंघन, पुलिस बर्बरता, गुप्त जेलों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जुड़े मुद्दों पर उसके मानवाधिकार रिकार्ड की आलोचना होती रही है। ड्यूमा के एक सूत्र ने दस्तावेज का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिका में हजारों बच्चें दुव्र्यवहार के शिकार हैं, जिसके परिणामस्वरूप अकेले वर्ष 2010 में ही 1,600 बच्चों की मौत हो गई। रपट में विशेष रूप से बताया गया है कि अमेरिका में रूस से गोद लिए गए बच्चों के साथ खासतौर पर बुरा बर्ताव किया जाता है। रपट में अमेरिका के गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) का हवाला देते हुए रूसी राजनयिकों ने बताया कि सौ में से एक पुलिस अधिकारी यौन उत्पीड़न, अभद्र व्यवहार या बलात्कार जैसे आपराधिक मामलों में शामिल हैं। जेलों के संदर्भ में रपट में कहा गया है कि अमेरिका ही दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां कैदियों की आबादी सबसे अधिक (22 लाख) है। 

अमेरिका शासन की ऐसी ही अमानवीय एवं गलत नीतियों को जब-जब मानवाधिकार का विषय बनाया गया तो उसने इन्हें कथित पूर्वाग्रहों और खामियों भरा माना और इनसे जुड़ी रिपोर्टों को सिरे से खारिज करता रहा है। इस बार खास बात यह रही कि अमेरिका ने यूएनएचआरसी की किसी खास रिपोर्ट को खारिज करने की बजाय उसने इस संगठन को ही खारिज कर दिया। यह सचमुच विडम्बनापूर्ण बात है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की दुनिया को ज्यादा मानवीय बनाने के लिए जिन मानवीय मूल्यों पर सर्वसम्मति बन चुकी थी, उनको लेकर दुनिया के ताकतवर अमेरिका जैसे देशों की प्रतिबद्धता लगातार कम होती जा रही है। इन शक्तिसम्पन्न राष्ट्रों की बर्बरता, क्रूरता एवं अमानवीय निर्णयों की जब भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंज हुई और यूएनएचआरसी ने इनके विरुद्ध कोई निर्णय लिया तो इन राष्ट्रांे ने तब यह कहकर कि ”हमें उनके उपदेशों की जरूरत नहीं“ टाल दिया था। अपने राष्ट्रीय हितों को पवित्र और सर्वोच्च बताने का चलन अमेरिका सहित शक्तिसम्पन्न राष्ट्रों में तेजी से पांव पसार रहा है। ऐसे में एक तरफ देशों के बीच टकराव उग्र हो रहा है, दूसरी तरफ किसी भी मामले में न्याय और अन्याय, मानवीय एवं अमानवीयता को लेकर कोई राय बनाना मुश्किल होता जा रहा है। जब भी नागरिकों के मानवाधिकारों पर बात होती है, इसके जवाब में सुरक्षाकर्मियों के मानवाधिकारों का सवाल खड़ा कर दिया जाता है। यह ध्यान रखना भी जरूरी नहीं समझा जाता कि मानवाधिकार की अवधारणा के मूल में राजनीतिक एवं सत्ता स्वार्थो के चलते व्यक्ति के अधिकारों की चिंता है, न कि व्यक्ति के चलते राजनीतिक एवं सत्ता के अधिकारों की। बात पेट जितनी पुरानी और भूख जितनी नई है ”मानवाधिकार“ की। दुनिया में जहां-जहां भी संघर्ष चल रहे हैं, चाहे सत्ता परिवर्तन के लिए हैं, चाहे अधिकारों को प्राप्त करने के लिए, चाहे जाति, धर्म और रंग के लिए वहां-वहां मानवाधिकारों की बात उठाई जाती रही है। मानवाधिकार संस्थाएं सरकारों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए ही गठित की गईं हैं। ऐसे में खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रहरी बताने वाला अमेरिका ही यूएनएचआरसी को खारिज कर रहा हो तो मानवीय मूल्यों से जुड़े प्रश्नों पर धुंधलका ही पडे़गा। वैयक्तिक अहंकार, सत्ता की महत्वाकांक्षा, स्वार्थ एवं स्वयं को ताकतवर सिद्ध करने की इच्छा ही मानवाधिकार की सबसे बड़ी बाधा है। जब राष्ट्र की सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच टकराव होता है तो राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, परन्तु इस बड़े सिद्धान्त की ओट में कोई खेल नहीं होना चाहिए। कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। कोई बदले की भावना नहीं होनी चाहिए। किसी भी तरह के स्वार्थ को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए। जबभी ऐसा होता है तो भौतिक हानि के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने की संभावनाएं व्यापक हो जाती है।

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